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हमारे गांवों के दो सबसे बड़े आतंक : जींस और मोबाइल

हमारे गांवों के दो सबसे बड़े आतंक : जींस और मोबाइल

रत्नाकर त्रिपाठी

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कल एक मित्र का मेल आया. मुंबई से. मुंबई में भोजपुरिया समाज के संगीत पर एक फिल्म बना रहीं हैं. साथ में एक शो का ऑडियो अटैचमेंट लगा था. अनुरोध था कि कुछ कठिन यानी खांटी  भोजपुरी शब्दों का मतलब समझा दीजिये.

सबसे पहला गाना एक दोगाना-संवाद टाइप का निकला. पत्नी अपने प्रवासी पति से दो मांगे कर डालती है – एक तो जींस लेते आना सैयां, और संग में एक मोबाइल भी लाना. पति साहब सहम कर कुछ लम्बा तर्क देने लगते हैं – मोबाइल तो लूँगा भरसक, लेकिन ये जींस वाली बात सही नहीं है – अपने गाँव वाले क्या कहेंगे! सुन कर हंसी भी आयी और कुछ क्षोभ सा भी हुआ. इस नयी ब्याही लड़की को लगा होगा कि चलो अब शादी हुई, माँ बाप के अंकुश से उबरे, तो ये अपनी एक पागल तमन्ना भी पूरी हो जाएगी. पर ऐसा कहाँ से?

लेकिन फिर याद आया – ये आम गाना नहीं है. ये तो सारे हिंदी भाषी प्रान्तों की सोच का सार है, यथार्थ है. हरयाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश, मुज़फ्फरनगर वगैरह में जाट खापों में भी तो यही मुहिम चली हुई है – यानी अपनी गवई संस्कृति के दो मूल दुश्मन हैं – जींस और मोबाइल.

जींस पहन कर लड़कियां अपने छोरों को पागल कर देती हैं, गाँव में तरह तरह की अव्यवस्था फैलती है, फिर छोरा छोरी मोबाइल पर समय स्थान तय करके भाग लेते हैं. और अंजाम हैं वो विवाह जो होने ही नहीं थे, अगर कायदे से कहें. फिर खाप पंचायतें बुलनी पड़ती हैं. और भाई, कई बार तो ऐसे बच्चों को मार ही डालना पड़ता है! वो भी पेड़ से लटका कर या कुछ ऐसी क्रूरता से कि कोई फिर आगे बढ़ने की हिमाकत न करे.

लेकिन देखिये एक आम भोजपुरी गीत को जो इसी क्रूर परिस्थिति को एक मज़ेदार गाने में ढाल लेता है. इच्छा हुई कि यह गाना मुज़फ्फरनगर भेज दें उन खापों के पास जो शायद भोजपुरिया विनोद के जरिये अपनी तबियत कुछ हल्की कर लें और अपने जवान बच्चे बच्चियों को खदेड़ना बंद करें.

पर साथ में यह भी याद आया कि पूरी दुनिया में आप कहीं भी जाएँ, यही होता है. चाहे समाज कहीं अफ्रीका का हो, एशियन हो, या सुदूर अमेरिका का – समाज हर जगह अपनी लड़कियों महिलाओं को खुद अपनी इज्ज़त का प्रतीक मानता है. यानी, मुझे दो थप्पड़ मार लो तो बच भी सकते हो पर अपनी औरतों पर नज़र उठाई तो कहर मच जायेगा. इसमें अच्छा इरादा यहाँ तक दिख सकता है है कि अपनी औरतों को खुद अपने से पहले बचाना एक बड़ा चारित्रिक गुण है. लेकिन फिर बचाने के बाद उस पर धौंस जमाना – क्या इसमें भी कोई महानता दिखती है आपको?

अपनी इज्ज़त का प्रतीक तो बना दिया इन्हें, पर सवाल ये है कि इन इज्ज़त के प्रतीकों को क्या स्वयं कोई इज्ज़त  मिलती है? या सिर्फ प्रतीक बन कर घर में बुत बन कर बैठ जाना पड़ता है. सोचिये – एक कमसिन सी शादी शुदा लड़की एक दिन जींस पहन कर अपने गाँव का चक्कर भी नहीं मार सकती.  ना ही नैहर का न ससुराल का. नैहर यानी वही गाँव जहाँ उसने बचपन में अमरुद के पेड़ पर से फिसल कर केहुना भी तोड़ लिया होगा.. हाँ, अगर वह माध्यम वर्ग की है, तो दूर दिल्ली में वो अपने जी का बादशाह है. सास ससुर मिलने भी आये, तो वह तन कर अपनी जींस में घूमा करेगी, चाहे सासजी दांत पीसती अपने गुस्से की चटनी बनाते रहें!

कभी कभी, या झूठ क्या कहूं, अक्सर अथवा हमेशा ही लगने लगा है मुझे कि स्त्री की आज़ादी से पुरुष समाज जितना डरता है उतना और किसी चीज़ से नहीं डरता. पुरुष समाज की कितनी ताकत, कसरत, हँफनी सिर्फ इसी में जाती है कि कैसे औरत को घूँघट, बुरका में बंद रखें, कैसे जींस जैसी दैवी कृपा से उनको दूर रखें?

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अगर यही सारा चिंतन कहीं और किसी और कम में लगाया जाता तो समाज कहाँ से कहाँ निकल जाता!
लेकिन हर मर्द के सामने एक भयावह दुस्वप्न का चौड़ा भौंडा दैत्य खड़ा मिलता है – औरत आजाद होगी तो कोहराम मच जायेगा!!

जींस पहन लेगी तो मेरी हेरोइन तो वैम्प बन जाएगी. और मेरी मर्दानगी ठूंठ बन कर रह जाएगी! मैं किसी बकवास हिंदी फिल्म का साइड हीरो भर या कामेडियन बन कर रह जाऊंगा!
इसलिए मुझे लगता है कि असली आतंक मोबाइल या जींस का नहीं है.
मर्द औरत की आज़ादी से डरता है.
औरत मर्द की आज़ादी से डरती है
हम सब एक दुसरे की आज़ादी से डरते हैं

अंततोगत्वा, हम अपने आप की आज़ादी से डरते हैं. इसीलिए अचरज नहीं कि हमेशा कोई ना कोई गाड़ीवान  हमको जोत कर सारी ज़िन्दगी चलाता रहता है!

हम दिल में अपनी सारी शिकायतों का हुक्का गुडगुडाते चलते रहते हैं एक कल्पना के नवाब की तरह!

बाई द वे, बिहार के सन्दर्भ में – इस आतंकी लिस्ट में साइकिल भी जोड़ना ना भूलें!

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One Response

  1. abhiranjan kumar says:

    this is not correct to say that jeans and mobiles are the two enemies of our village. In fact both have become our good friends. both also writes about the modernity trend of the villages. Although there are much to do at the level of qualitative changes in the villages yet these two are the begining of changes. They display the real secular character of the changes. for villages, mobile revolution is really helpful.agriculture, education. internet, entertainment, connectivity–all makes life simple and happy–so why rob the villages of this modern day advantage?

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