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गए पूस की ठार
लेखक :सुभाष रबिन्द्र झा
गये पूस की ठार
पूस का महिना था | अभी अगहन की ख़राब फसल पर गरीब कृषकों की आँखों का पानी सूखा भी नहीं था कि पता नहीं क्यूँ परमात्मा को पुनः गरीबों का जीवन दुर्गम बनाने की सूझी | कड़ाके की ठण्ड पड़ने लगी...