
सौरभ का फ़िल्मी चक्कर
सौरभ का फ़िल्मी चक्कर
तीस मार खां
तवायफ की लुटती इज्ज़त बचाना और तीस मार खां फिल्म को देख तारीफ करना– दोनों बेकार हैं। छुड़ाना कुत्ते के मुंह से हड्डी और लुटाना इस फिल्म पर अपनी नोटों की गड्डी– दोनों बेकार हैं।
फिल्म में किसी ने एक्टिंग की होती तो यहां उसका ज़िक्र भी किया जाता लेकिन फराह खान की इस फिल्म सबने केवल ओवर एक्टिंग ही की है। ऐसे में फिल्म की फज़ीहत का मौका छोड़ना गलत होगा। दरअसल फराह खान ने शोर मचाने वाले, भद्दे और बेतुके सिनेमा की मिसाल कायम की है इस फिल्म में। फिल्म आपको मनोरंजन नहीं, इमोशन नहीं, आंसू नहीं, ख़ुशी नहीं बल्कि दर्द देती है, सिरदर्द। सिनेमा हाल से बाहर निकल ऐसा महसूस होता है कि पिछले सवा दो घंटे आपने अपने सिर पर हथौड़े बजवाए हैं।
ऐसा हर बार संभव नहीं कि सिनेमा और समाज दोनों अलग दिशा में चलें और सिनेमा को सफलता मिले। समाज थोड़ा जागरूक, चतुर, तेज़, अराजकता से भरा होने की दिशा में चले और सिनेमा में मौजूद किरदार असलियत से कटे, बेवकूफ, भटके हुए और भटकाने वाले नज़र आएं।
फिल्म की कहानी किस दुनिया, किस युग के सपने को साकार करती है यह बात यहां बयां कर पाना इसलिए मुकिल है क्योंकि इसका जवाब खुद बनानेवालों के पास भी शायद ही हो। बनाने वालों ने केवल कुछ नामी लोग जुटा लिए और तय कर लिया कि अब बस इनके साथ कुछ न कुछ आड़ी तिरछी फिल्म बना

तीस मार खां
डालनी है। ऐसा लगा कि स्क्रिप्ट लिखने का सामूहिक जिम्मा करीब छः लोगों ने उठा लिया और अपने अपने हिस्से के पन्ने लिख के ले आए, फिर उन्हें आपस में मिला दिया। फिल्मी दुनिया, किरदारों की पैरोडी फिल्म के कुछ हिस्से में डालना अलग बात है बजाय कि पूरी फिल्म को पैरोडी बना देने के।

तीस मार खां
गलती अपनी है जो इस फिल्म को फिल्मी पैमाने पर आंक रहे हैं। जनहित में ऐसा मान लेते हैं कि ये एक वीडियो फुटेज है जिसमें थोड़ा नहीं, बहुत गीत संगीत है और यह ज्यों का त्यों दर्शक के लिए परोस दिया गया है। फराह खान ने अपने घर रिश्तेदारी में मौजूद हर छिपी प्रतिभा को मौका दिया है। इतने प्रमोशन और जवानी का तकाजा है कि फिल्म के बारे में खुलेआम बुराई नहीं करनी है। हर राह चलते आते जाते आदमी को रोक कर आगाह नहीं करना है कि भाई फिल्म मत देखना।
सारी ज़ोर आज़माईश के बाद भी फिल्म की कहानी और उसका वजूद आपके ज़हन से इस कदर तेज़ी से साफ हो जाएगा जितनी तेज़ी से शीला की जवानी जुबां पर चढ़ गया था। हाँ ये आप शर्त लगा लें कि शीला की जवानी गाना कब आया और कब गया यह आपको फिल्म खत्म होने के बाद याद करने पर भी शायद ही याद आए। रॉबरी के कॉन्सेप्ट पर एक नई किस्म की फिल्म बनाने का या एक नए प्रकार के सुपरहीरो को गढ़ने का मौका फराह खान ने गवां दिया लगता है।
सर्दी के मौसम में अगर शहर में अच्छी धूप खिली हो तो फिल्म देखने की बजाय छत पर उसका आनंद लें। अगर कहीं सर्कस लगा हो तो वो भी देख सकते हैं। टिकट पर खर्च होने वाले पैसों को नए साल के जश्न के लिए भी जोड़ सकते हैं। फिल्म एक दो महीने पर जब टीवी पर आए तो भी देखकर समय नष्ट करने के बारे में अच्छे से सोच विचार लें। अक्षय कैटरीना आदि का ज़िक्र यहां इसलिए भी नहीं किया है क्योंकि ऐसा करने में कहीं उनके कुछ पिछले अच्छे कामों की भी तौहीन न हो जाए लगे हाथ। किसी से दुश्मनी निकालनी हो तो उसे ये फिल्म देखने की सलाह ज़रूर दें।
अगर फिल्म के शिकार हो चुके हैं तो मेरी आपसे हमदर्दी है
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(लेखक सौरभ कुमार गुप्ता दिल्ली में एक नेशनल न्यूज़ चैनल में कार्यरत हैं और बिहार डेज़ एवं मीडियामंच के लिए खासतौर पर फिल्मों की समीक्षा करते हैं.)
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Dear Saurabh. I truly agree with you, as a maker and as an audience. A good review.