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प्रेम कुमार मणि का नीतीश कुमार(बिहार के मुख्य मंत्री)को लिखे पत्र से उपजे कुछ सवाल

प्रेम कुमार मणि का नीतीश कुमार(बिहार के मुख्य मंत्री)को लिखे पत्र से उपजे कुछ सवाल

-अशोक यादव

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इधर कुछ ब्लोग्स पर कहानीकार, सामाजिक न्याय के विचारक और राजनीतिक तथा जनता दल (यू) से बिहार विधान परिषद के सदस्य  प्रेम कुमार मणि (मणिजी) का २५ अप्रैल, २००९ को लिखा पत्र, जो नीतीश जी को संबोधित है, प्रकाशित हुआ है. यह पत्र कुछ सवालों को जन्म देता है.

. यह पत्र दो वर्षों के बाद क्यों प्रकाशित किया जा रहा है?

. पत्र को पढ़ने से पता चलता है कि मणिजी ने नीतीश जी से बड़ी-बड़ी अपेक्षाएं पाल रखी थी मसलन वे नीतीश जी को सबआलटर्न नेहरु बनता देखना और बिहार को प्रयोगशाला बनाना चाहते थे. मणि जी ने स्पष्ट नहीं किया है कि किस बात की प्रयोगशाला. लेकिन मणिजी के वैचारिक झुकाव को देखते हुए यही लगता है कि मणि जी चाहते थे कि नीतीश जी बिहार को सामाजिक न्याय की प्रयोगशाला बनाएँ.

. २००५ के नवम्बर महीने में नीतीश जी की सरकार बिहार में आरूढ़ हुई थी. मणिजी के प्रस्तुत पत्र को पढ़ने से पता चलता है कि २००९ आते-आते नीतीशजी और नीतीश सरकार से मणिजी का पूरा मोहभंग हो चुका था.

. जिस नीतीश में मणिजी सबआलटर्न नेहरु का अक्स देख रहे थे, वह नीतीश चार वर्षों में एक खतरनाक खलनायक बन जाते हैं जिनके लिए मणिजी रणवीर सेना, भूमि सेना, हिटलर, नरेन्द्र मोदी आदि का उदाहरण अपने पत्र में प्रस्तुत करते हैं.

बिहार की राजनीति को जानने वाले जानते हैं कि नीतीश के नेतृत्व में जनता दल (यू)-भाजपा गठबंधन को सत्ता में लाने वाले में मणिजी की महत्वपूर्ण भूमिका रही थी. ये मणिजी ही थे जिन्होंने अति-पिछड़ों और पसमांदा जमात को राजद से अलगकर राजग से जोड़ने की रणनीति तैयार किया था. जब सामाजिक न्याय और धर्मनिरपेक्षता दोनों में विश्वास करने वाले लोग मणिजी से पूछते थे कि भाजपा के साथ चलने वाले जनता दल (यू) से आप खुद और दूसरों को कैसे जोड़ रहे हैं तो उनका जवाब होता था कि क्या बाबा साहेब अम्बेदकर ने कांग्रेस के खिलाफ अंग्रेजों से समझौता नहीं किया था. ऐसा समझाते हुए मणिजी यह भूल जाते थे कि अंग्रेजों ने सही में इस देश में सामाजिक न्याय को आगे बढ़ाने के लिए कई काम किये थे.

मणिजी ने पत्र में संकेत दिया है कि नीतीश सरकार की अति पिछड़ों, महादलित और अकलियत से संबंधित नीति उन्होंने ही तैयार किया था. दुनिया जानती है कि इसी नीति के बल पर नीतीश सरकार दुबारा २०१० में एतिहासिक बहुमत से जीत कर सत्ता में आयी. इस प्रकार, मणिजी ने एनडीए को न केवल  २००५ बल्कि २०१० के चुनाव में भी जीत का ब्लूप्रिंट तैयार करके दे दिया. क्या एनडीए में रहते हुए जनता दल (यू) वह काम (समान शिक्षा प्रणाली और भूमि सुधार, उदाहरण के लिए) कर सकता  है जिसकी अपेक्षा मणिजी करते हैं?

लालू और नीतीश, दोनों ही सत्ता की राजनीति करने वाले व्यवहारवादी राजनीतिक हैं. ये सामाजिक न्याय से ज्यादा सामाजिक इंजीनियरिंग में विश्वास करने वाले लोग हैं. लालू और नीतीश का राजनीतिक इतिहास यदि हम अध्ययन करें तो पायेंगे कि बिहार में चलने वाले सामाजिक न्याय के आंदोलनों में इनकी भागीदारी का कोई पुख्ता प्रमाण नहीं मिलता है. ये दोनों नेता जे पी आंदोलन की उपज हैं जिसका सामाजिक न्याय से सीधे-सीधे कोई लेना देना नहीं था. इन नेताओं की ट्रेनिंग सामाजिक न्याय की पाठशाला में नहीं हुई है. ये नेता पिछड़े वर्ग से आते हैं. अपने राजनीतिक हित में अपने जाति-वर्ग चरित्र के अनुरूप कभी कभी ये ऐसा काम कर जाते हैं जिससे सामाजिक न्याय को कुछ हासिल जो जाता है, जैसे, नीतीश ने अति-पिछड़ों का वोट बैंक बनाने के लिए ग्राम पंचायत और शहरी निकाय में इनको एकल पदों पर आरक्षण दिया. हमारे ये नेता by conscious नहीं बल्कि by default सामाजिक न्याय को कभी-कभी फायदा पहुँचा देते हैं. ये राजनीतिक मजबूरिओं से लड़ने वाले नहीं बल्कि सामंजस्य बैठा कर चलने वाले राजनीतिज्ञ हैं. इनसे रेडिकल होने की उम्मीद करना न केवल अपने आप से बल्कि इनके साथ भी अन्याय करना है. पिछड़े समाज के इन नेताओं को सामाजिक न्याय के लिए चलने वाले आंदोलनों से लाभ पहुँचता है किन्तु इनसे सामाजिक न्याय के आंदोलनों को प्रत्यक्ष कितना लाभ मिलता है, यह शोध का विषय है. हमारे ये नेता मंडल क्रांति के चलते आज ऊंचाई पर दिखाई दे रहे हैं बदले में मंडल क्रांति को इनसे कितना मिला, यह हम सब लोगों ने देखा है. इन बातों के बावजूद क्या हम कह सकते हैं कि इनके सत्तारूढ़ होने से नहीं होना ही अच्छा था?

२००५ के चुनावी जीत के बाद जनता दल (यू) की ओर से मणिजी विधान परिषद का सदस्य बने. सामाजिक आंदोलनों से जुड़े लोगों की अपेक्षा थी कि विधान परिषद की सदस्यता मिलने  से इन्हें जो सुविधा प्राप्त होगी और इनका जो प्रभाव बनेगा उससे सामाजिक न्याय की वैचारिक धारा को मजबूत बनाने का काम होगा. लेकिन निराशा ही हाथ लगी. ‘जन विकल्प’ के प्रकाशन से इस अपेक्षा को बल मिला था. किन्तु इन्होंने पत्रिका का प्रकाशन बंद कर दिया. कारणों का पता आज तक नहीं चल पाया. यदि पत्रिका को बंद करने के लिए नीतीश जी की ओर से कोई दवाब था तो यह भी पत्र का एक विषय बनना चाहिए था. चुनाव के पहले मणिजी ने ‘बिहार परिवर्तन मोर्चा’ नाम से एक संगठन बनाया था जो चुनाव के बाद हवा हो गया. जबकि इन्हें सामाजिक न्याय की वैचारिक धारा बहाने पर ध्यान केंद्रित करना था तो जनता दल (यू) की अंदरूनी राजनीति इनका मुख्य सरोकार बन गया. कहीं मणिजी से हमारी अपेक्षाएं भी उसी तरह misplaced तो  नहीं है जैसा कि नीतीश जी से मणिजी की या दोनों ही genuine हैं?

One Response

  1. सामाजिक न्याय की तो बात छोडिये ,सामान्य न्याय भी मिल जाए तो
    ,बहुत काफी हासिल हो जाएगा

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