
पंकज शुक्ल
झाड़ै रहो कलक्टरगंज

पंकज शुक्ल
कौआ कान लइगा..
पंकज शुक्ल
नई फौज क मुंहि मा हिंदी सिनेमा क्यारौ खून लागि चुका है। इ पंचै प्रोड्यूसर केरि जेब त अखिरी चवन्नी निकारै क चक्कर म याक अइसे पेशा क बदनाम कई दीन्हेनि, जेहि कि धार तेरे काल्हि लगे बड़े त बड़े निर्माता कांपा करति रहै। फिल्म पत्रकारिता अब पेशा नाई अखबारन क्यार सजावटी सामान बनि चुकी है।
याक बहुत मसहूर कहावत अहै, कौआ कान लइगा। या कहावत तब कही जाति है जब गांव जवारि म कौनो दूसरे क कहे पर कौन्यू बात क्यार तिल का ताड़ बनावन लागति है। नई पिच्चरन केरे बारे में आजु काल्हि ज्यादातर अखबारन म छपै वाली समीक्षनौ क्यार यहै हाल है। फिलम देखइया इतवार क अखबार पढ़िके पिच्चर द्याखै न द्याखै खातिर मनु बनाना करति रहैं, लोगन कि या आदत देखि क अब फिल्म समीक्षा जौने दिन पिच्चर रिलीज होति है, वोई दिन छपै लागि है। लेकिन, असल बात या है कि इनमा तेरे ज्यादातर समीक्षन अब वहै लिखा जाति है जौन फिल्म क्यार निर्माता निर्देशक चाहति हैं।
जमाना पिछले चार पांच साल म बहुत तेजी त बदला है। चारिउ ओर जहां द्याखौ तहां बेइमानन की जै जैकार हुई रही। यू जमाना अइस अहै जब कलम कइहां बजार क हाथन गिरवी रखि दे वाली याक पूरी फौज तैयार हुई रही। या कहौ कि गिरोह तैयार हुइ रहा। यू गिरोह आए मैनेजमेंट केरे उइ उस्तादन क्यार जउन अखबार कइहां साबुन तेल कि नायं ब्याचा चाहत है। इन क्यार एकुइ मतलब है कि उनके केबिन म टंगे सेल्स औ मार्केटिंग क्यार ग्राफ ऊपर कइहां तने रहैं। इ नई फौज क मुंहि मा हिंदी सिनेमा क्यारौ खून लागि चुका है। इ पंचै प्रोड्यूसर केरि जेब त अखिरी चवन्नी निकारै क चक्कर म याक अइसे पेशा क बदनाम कई दीन्हेनि, जेहि कि धार तेरे काल्हि लगे बड़े त बड़े निर्माता कांपा करति रहै। फिल्म पत्रकारिता अब पेशा नाई अखबारन क्यार सजावटी सामान बनि चुकी है। पिछले साल दिल्ली म याक दोस्त क हियन बैठे बैठे अइसेहे बात चलि परी। इ दोस्त उत्तर भारत क्यार बहुत बड़े फिल्म वितरक अहैं। उइ कहन लाग कि आजु काल्हि तो फिल्म समीक्षकन केरि पांचों अंगुरी घी मा हैं। नई पिच्चर रिलीज होए त पहिले इ पंचन क घरै कलर टीवी पहुंचति है, डबल डोर फ्रिज पहुंचति है और कबौ कबौ विदेश यात्रा क्यार टिकटौ पहुंचति है।

कौआ कान लइगा
हमरे इ दोस्त क फिल्मी दुनिया केरि भितरी बहिरी तमाम खबरैं पता रहती हैं। ऊइ यू कहेन तौ, लेकिन पता नाईं कि एहि बात म कितनी सच्चाई होई। लेकिन अगर उन केरि बात गलत ह्वातै तो काहे याके पिच्चर कइहां एक समीक्षक एक स्टार द्यातै और दूसर चार औ कबहूं कबहूं पांच स्टार तक दइ द्यातै। कहूं न कहूं तो दालि म काला जरूर है।
इ सगरी बातें हमरे दिमाग म तबते घूमि रहीं जब ते हम फिल्म 3 थे भाई दीखि। या पिच्चर हम बड़े हौसले त द्याखै गे रहन। पिच्चर रिलीज होए ति पहिले एहि क्यार निर्माता कहा तेइन कि हिंदी फिल्म बनावै वाले निर्मातन क कहानी की समझि ना अहे। लेकिन पिच्चर देखि क निकरेनि तो यहै जानि परा कि राकेश ओमप्रकाश मेहरौ वहै करन लाग हैं जौनु अब लगे आमिर खान औ अक्षय कुमार करति रहै। पिच्चर रिलीज होए ते पहिले बड़ी बड़ी बातै करब अब सितारन क्यार शौक बनिगा है। उनकी बातैं सही मानि क पिच्चर द्याखे लोग पहुंचि जाति है और ठगे जाएक अस एहसास लीन्हें चुप्पै अपने अपने घरै लौटि जाति अहैं। लेकिन अब दरसकन कि समिझम यू गोरखधंधा आवन लाग है। एहि क्यार फल अक्षय कुमार अबे लगै चखि रहे हैं, दूसरौ लोगन कि अकल जल्दी ही ठिकाने आ जाई। तो कहै कि मतलब यू कि अगली दांय पिच्चर द्याखै जाए क फैसला अखबार पढ़ि कै कतौ न कीन्ह्यौ काहे का पता कि तुम पंचै पिच्चर की बड़ाई पढ़ि कै चले जाओ पिच्चर द्याखै और लिखै वाला बैठि होए बैंकॉक केरे कौनौ मसाज पार्लर मइहां, प्रोड्यूसर केरे पैसा तेरे मौज करति भै।
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(झाड़ै रहो कलक्टरगंज, मुंबई में बसे समालोचक, निर्देशक और लेखक पंकज शुक्ल का साप्ताहिक स्तंभ है, जो वह अब हर शुक्रवार को बिहारडेज़ के लिए लिखा करेंगे। ये नाम रखने के पीछे उनकी बचपन की कुछ यादें हैं। तब तक पूरब का मैनचेस्टर कहे जाने वाले कानपुर की मिलें मजदूरों के पसीनों के कब्रिस्तान में तब्दील नहीं हुई थीं। कलक्टरगंज में सामान खरीदना तब स्टेटस सिंबल हुआ करता था, और जैसे अब लोग विदेश यात्रा के प्रसंग अपनी शेखी बघारने के लिए सुनाते हैं, गांव कूचे के लोग तब पटरे की जांघिया पहने कलक्टरगंज की यात्रा चबूतरों पर बैठे सुना करते थे। बुजुर्गवार तब ऐसे मौकों पर ऐसी लंतरानी करने वालों पर यही जुमला कसते थे- झाड़ै रहो कलक्टरगंज!)
(पंकज शुक्ल से उनकी ईमेल आईडी pankajshuklaa at gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है)
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