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झाड़े रहौ कलक्टरगंज-खुलै क चाहीं अवधी औ भोजपुरी एफएम चैनल

पंकज शुक्ल

झाड़े रहौ कलक्टरगंज

खुलै क चाहीं अवधी औ भोजपुरी एफएम चैनल

पंकज शुक्ल

बिहार म अगर कौनो भोजपुरी एफएम चैनल सुरू होए और वहि पर भोजपुरी फिल्मी गीतन क साथ साथ भोजपुरी, मैथिली, मगही क्यार भजन, लोकगीत औ दूसर संगीत प्रसारित कीन जाए तो हमका पक्का यकीन है कि चैनल क सुनै वालेन केरि लाइन लागि जाई। अइस याक दुई चैनल गोरखपुर औ बनारस तेरे सुरू कीन्ह जा सकति हैं।

जादा दिन नाई भे जब सहरन म रेडियो सुनब गरीबी कि निसानी मानी जाति रहै लेकिन एफएम चैनलन के बाद जेहिका द्याखौ वहे कानन म स्पीकर लगाए चला जा रहा। या बात सही अहै कि सरकारी कब्जा तेरे निकरै क बादि रेडियो केरि दिन दूनी रात चौगुनी तरक्की भै अहै। सरकार क्यार आंकड़ा बतावति हैं कि रेडिया अपने देस म 98.5 फीसदी लोगन तक पहुंचि सकति है। आजु क तारिख म पूरे देस म साढ़े दस करोड़ घरन म रेडियो मौजूद अहै औ या गिनती टेलीविजन वाले घरन तक बहुत जादा है।
कहेक मतलब यू कि चाहा जाए तो रेडियो तेरे बहुत काम लीन जा सकति है। या बात नीक सुनाई परति है कि कुछ एफएम चैनल अब केवल अपने आरजेन केरी बतकही और फिल्मी गानन तेरे आगे क्यारि स्वाचन लाग है। म्यूजिक कंसर्टन क्यार लाइव प्रसारण औ तरह तरह क्या नए कार्यक्रम बनन लाग हैं। लेकिन, हमार मानब है कि अपने देस केरे अलग अलग राज्यन क बोली क आगै बढ़ावैम ई एफएन चैनल बहुत काम करि रहे। दक्खिन म निरे चैनल है जौन हुअन कि बोली म चलति हैं, लेकिन उत्तर म सिवाय खड़ी बोलि क कौनो स्थानीय बोलि म कार्यक्रम सुनाई नाई परति।

खुलै क चाहीं अवधी औ भोजपुरी एफएम चैनल

एकु जमाना रहै जब आकाशवाणी लखनऊ त अवधी बोलि म तमाम कार्यक्रम सुनाई परति रहै। दुपहर म जगराना बुआ केरि पंचायत लागति रहै और इतवार क दिन साम क बहिरे बाबा क्यार नाटक सुनावा जाति रहै। दून्हू कार्यक्रम अपने जमाना क्यार सुपरहिट कार्यक्रम रहे हैं। अब तो खैर जमाना हुइगा आकाशवाणी लखनऊ सुने लेकिन गांवै जाए पर जौन एफएम चैनल सुनाई परति हैं, उनमा और दिल्ली बंबई के एफएम चैनलन पर कौनो अंतर हमका दिखाई नाई परा।
बिहार म अगर कौनो भोजपुरी एफएम चैनल सुरू होए और वहि पर भोजपुरी फिल्मी गीतन क साथ साथ भोजपुरी, मैथिली, मगही क्यार भजन, लोकगीत औ दूसर संगीत प्रसारित कीन जाए तो हमका पक्का यकीन है कि चैनल क सुनै वालेन केरि लाइन लागि जाई। अइस याक दुई चैनल गोरखपुर औ बनारस तेरे सुरू कीन्ह जा सकति हैं। लेकिन, नवा काम करै खातिर हिम्मत चाही औ एहि के खातिर बड़े मीडिया घरानौ कइहां स्वाचैक परी। काहे क, लीक लीक गाड़ी चलै, लीकहिं चलै कपूत, लीक छांड़ि तीनहि चलै सायर सिंह सपूत।
एफचैनलन क्यार तीसर फेज जल्दी हि सुरु होए वाला है, हमार बड़ा मनु है कि अबकी दांय उत्तर भारत म लोक भाषा औ लोक बोलिन क्यारौ चैनल सुरु होएं। एहि तना लखनऊ और कानपुर तेरे अवधी क्यार चैनल सुरू हुइ सकत अहै। अवधी म तो संगीत केरि कौने कमी ही नाई है। नौटंकी त लइके बिरहा, कजरी, फाग तक चाहै जोनु कुछ बजाओ। कबीर क भजन सुनाओ। तुलसी की रामचरित मानस बजाओ। सुनै वाले तो लार टपकानव लगिहैं। सुरू तो करौ। बुंदेलखंड घाईं निकरि जाओ तो आल्हा है अउरौ ना जानै कित्ती चीजें हैं जिनक्या इस्तेमाल एफएम चैनलन पर कीन्हिं जाए सकत है। लेकिन, एफएम चैनल चलावै वाले आरजेन केरि बकर बकर औ हिंदी सिनेमा क गानन क आगै कमै सोचि पा रहे। बिहारडेज कि मार्फत यू विचार हम मीडिया वालेन और उत्तर प्रदेश, बिहार मइहां रहै वाले रईसन क सामने उछारि रहेन। अबकी एफएम चैनल भोजपुरी औ अवधी म चलावैक लाइसेंस लेओ। चैनल केरि एफपीसी (फिक्स प्वाइंट चार्ट) बनावै क खातिर हम हमेसा तैयार हन। इ इलाका म पैसा वाला कौनो सपूत तो हुइबै करी।

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(झाड़ै रहो कलक्टरगंज, मुंबई में बसे समालोचक, निर्देशक और लेखक पंकज शुक्ल का साप्ताहिक स्तंभ है, जो वह अब हर शुक्रवार को बिहारडेज़ के लिए लिखा करेंगे। ये नाम रखने के पीछे उनकी बचपन की कुछ यादें हैं। तब तक पूरब का मैनचेस्टर कहे जाने वाले कानपुर की मिलें मजदूरों के पसीनों के कब्रिस्तान में तब्दील नहीं हुई थीं। कलक्टरगंज में सामान खरीदना तब स्टेटस सिंबल हुआ करता था, और जैसे अब लोग विदेश यात्रा के प्रसंग अपनी शेखी बघारने के लिए सुनाते हैं, गांव कूचे के लोग तब पटरे की जांघिया पहने कलक्टरगंज की यात्रा चबूतरों पर बैठे सुना करते थे। बुजुर्गवार तब ऐसे मौकों पर ऐसी लंतरानी करने वालों पर यही जुमला कसते थे- झाड़ै रहो कलक्टरगंज!)
(पंकज शुक्ल से उनकी ईमेल आईडी  pankajshuklaa at gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है)

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