दो कवितायेँ
वरुण पासवान
पटना में गंगा
पड़ी हुई है एक किनारे पर
होगी कोई नदी
कोई विस्तार पानी का
अपनी बैठक का कोई झोलदार कोना महज
जहाँ भटक के ना पहुंचा कोई मेहमान
ना ही टिका कोई मेज़बान
दूरियां पार करने को एक पुल है
उसके नीचे जो जलराशि है
वही गंगा कहती है
नदी भागी पटना से या पटना सरका दूर
पता नहीं
किसे फुरसत है कि
चुन चुन कर दोष मढ़े
निपटारा करे इस चौड़ाते वियोग का
घाट पर मुर्दे जलते हैं
देवियों का धसान होता है
केश खोल कुछ नासामझ, असावधान औरतें
डुबकियाँ लगाती हैं
हाँ, छठ पर एक अलग समां होता है, फिर भी तो
सब ऊपर ताकते हैं सूर्य को
नीचे घुटने का गीलापन मर्म तक पहुँच नहीं पाता
सबके सब अपनी भक्ति की गढ़ैया में डूबे रहे तो
गंगा किसे याद आती है
रह रह कर ताक लेता है पटना बायीं ओर
नदी याद आ जाती है
इसमें कोई दृष्टिकोण नहीं है
सिर्फ गंदे नालों का वास्तु है
पटना अब भूल चूका है
उन धाराओं को
जिन्होंने मरोड़ें झेल झेल, बड़ी बेचैनी से
इस शहर को बसाया
अब पटना बस चुका है, भली भांति संपन्न
फिर भी नदी बही जाती है, यही इसकी नियति होगी
जाने दो, जहाँ भी जाती है
इस से पहले कि …
सिर्फ सिहरन रही तुम
कोई शब्द नहीं बन पाया
स्फोट से पहले ही
ध्वनि को घसीट ले गया कोई कहीं
उच्चरित होने से पहले ही बिखराया,
सार्थक होने से पहले ही शब्द कूद गया आठवीं मंजिल से, नीचे
पत्थर पर छितराया
अब कभी शाम का आसमां जो तकता हूँ
लगता है शायद घुमड़ते बादल
अख्तियार कर लेंगे तुम्हारी आकृति
दूर से पहचान लूँगा तुम्हे इससे पहले कि
मेघों का चेहरा
फिर बदल जाये,
इस तरह आते रहेंगे क्षण अनवरत
कभी बर्फ बन आओगी कभी आभा
कभी मरीचिकाओं में तैरता वहम सतत
यही अपूर्णता की चाहना
कभी खुजलाहट सी, खेद सी, स्थाई खाज भी
बन कर रह जायेगी,
मर्म के चौड़े मैदान पर
दौड़ता एक साया कभी
जो वेग से धधकता रहे
जिसमे ना शोक हो, ना आह्लाद, ना ही शून्यता
एक बेचैन थरथराहट जो पिंजरे में बंद होकर
ना ही रुकती हो ना ही उड़ने को तैयार हो!

Shahar se dur jati ganga aur uske karno ka jo ullekh aapne kiya hai vi nisndeh utni saraahniy hai Jitni aapki lekhan shaily…