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गए पूस की ठार
लेखक :सुभाष रबिन्द्र झा
गये पूस की ठार
पूस का महिना था | अभी अगहन की ख़राब फसल पर गरीब कृषकों की आँखों का पानी सूखा भी नहीं था कि पता नहीं क्यूँ परमात्मा को पुनः गरीबों का जीवन दुर्गम बनाने की सूझी | कड़ाके की ठण्ड पड़ने लगी...
मैं चला…चलता रहा…
सुभाष रविन्द्र झा
आदतों की हद तोड़कर जो मैं निकला रास्ते पर
तो मंजिल पाने का डर सा था…
मिलते ही एक पल पहले तक रहे दोस्त बैरी न हो जाते!
पर मैं चला…चलता रहा…
जब मोड़ आता, नए दोस्त बनते;
कुछ मेरी खुद से पहचान कराते,
तो...
अल्लाह का पैगाम !
सुभाष रबिन्द्र झा
सुनो सुनो अल्लाह का पैगाम आया है,
अभी बहुत बाकी है वक़्त, अभी कहाँ हमने ज़ोर आज़माया है !
जो ज़िन्दगी का मतलब ना जाने वो कहलाएगा बेगैरत,
आगाज़ से पहले अंजाम का सोचना है ग़लत |
अभी तो बहुत कुछ करना है...
एक हरी पत्ती
- सुभाष रबिन्द्र झा
हे प्रभु ! किस अद्भुत वेला में, तुने यह सृष्टि रचाई |
जीवंत हुई अनुपम रचना, तुने जो कला लगाई ||
असमंजस में सब देव-गण, जाने अब आगे क्या होगा |
जब नाट्य-प्रसंग के दर्शन को, जा पहुंचे तुम दर्शक दीर्घा ||
पृथ्वी...