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सौरभ का फ़िल्मी चक्कर- रक्तचरित्र

सौरभ का फ़िल्मी चक्कर सौरभ का फ़िल्मी चक्कर रक्तचरित्र टाईटल और खून की परवाह किए बगैर फिल्म देखने जाएं। अच्छी लगेगी। भूल जाना होगा इस बात को कि विवेक ओबेरॉय ने इससे पहले किसी फिल्म में एक्टिंग की थी। भूलना होगा राम गोपाल वर्मा की उन... 

आक्रोश की फिल्म समीक्षा

सौरभ का फ़िल्मी चक्कर आक्रोश अच्छी फिल्म है। ज़रूर देखें।आक्रोश आपके भीतर वो सारे इमोशन पैदा करती है जो एक फिल्म को देखकर पैदा होने चाहिए। क्यों न बनें ऐसी फिल्म जिसे देख थोड़ा सोचने को मन करे। सोचें उस फिल्म के बारे में, फसल पैदा... 

‘खिचड़ी’ और ‘दो दुनी चार’

सौरभ का फ़िल्मी चक्कर ‘खिचड़ी‘ और ‘दो दुनी चार‘ पिछले दो हफ्तों में रिलीज़ हुई दो फिल्मों का दर्द एक साथ बयां करने का मन है। दर्द इसलिए कि एक ने ऐसा स्तर छुआ, जो अपनी बनावट में न जाने कितनी फिल्में नहीं छू पातीं और दूसरी का दर्द... 
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सौरभ का फ़िल्मी चक्कर- दबंग

सौरभ का फ़िल्मी चक्कर दबंग डायरेक्शन, कहानी, संवाद, स्क्रीनप्ले, कास्टिंग, कलाकार, अदाकारी की बात अगर छोड़ दें तो मैं पूरे दावे के साथ कह सकता हूं कि फिल्म आपको बेहद पसंद आएगी। इनको छोड़ने के बाद फिल्म में बचेगा अजीब एक्शन, बेवजह गाने,... 

सौरभ का फ़िल्मी चक्कर- अंजाना अंजानी

सौरभ का फ़िल्मी चक्कर अंजाना अंजानी कॉमिक होते होते रह जाने वाले कई सीन। इमोशनल होते होते रह जाने वाले कई दृश्य। दिलचस्प होते होते रह जाने वाली कई अंजान गुंजाईशों का सिलसिला यह फिल्म। दो किरदार, केवल। टूटा दिल, खाली जेब लिए, बेफिक्री... 

सौरभ का फ़िल्मी चक्कर ‘लफंगे परिंदे ‘

सौरभ का फ़िल्मी चक्कर ‘लफंगे परिंदे ‘ कोई फिल्म अगर दूसरे हाफ से शुरू होती सी लगे तो सिनेमा हॉल में लेट पहुंचने का मलाल चला जाता है। इस बार नतीजा पहले। कहानी से खिलवाड़, किरदारों के नाम पर मज़ाक, बेअसर फिल्म की मिसाल और दर्शकों... 
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सौरभ का फ़िल्मी चक्कर पीपली लाईव

सौरभ का फ़िल्मी चक्कर पीपली लाईव लाईव होने की बजाय पीपली लाईव एक रिकार्डिंग है नत्था जैसे न जाने कितने उन लोगों की जो होते हुए भी नहीं हैं। छोटी फिल्म में बड़ी समस्याओं को कम किरदारों के ज़रिए दर्शाती पीपली की कहानी। गरीब किरदारों... 
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