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आखिर किसकी लेने की कोशिश है – “गैंग्स आफ वासेपुर”

आखिर किसकी लेने की कोशिश है - ”गैंग्स आफ वासेपुर”


-नवीन भोजपुरिया

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जबरदस्त क्या है -

- फिल्म के गीत संगीत , शायद भोजपुरी को आज के आधुनिक समय मे इस से बेहतर उडान की शुरुवात नही मिल सकती है ।
- फिल्म का देशीपन / खांटीपन ने मुझे फिल्म नदिया के पार की याद दिला दी , हर चीज जगह पे ,जो होना चाहिये वह था ,जैसा होना चाहिये था वैसा ही था ।
- फिल्म के प्रचार प्रसार के तरिके , सच मे तरिका पुरा का पुरा देशी ही रहा जिसने लोगो को आकर्षित किया
- दो तीन कलाकारो का अभिनय , नाम नही लुंगा लेकिन कुछ एक कलाकारो ने वाकई दिल चुरा लिया है ।
- पांच स्टार डाईरेक्ट स्नेहा खानविलकर को ,ये लडकी आसमान की बुलन्दियो को छुवे , और अनुराग कश्यप जी को बहुत बहुत धन्यवाद इनसे परिचय करवाने के लिये ।
- फिल्म को बनाने के लिये की गई मेहनत , जैसा हमने सुना है या जाना है वो वाकई पुरी टीम को सैल्युट करने को कहता है ।
- फिल्म के संवाद मे कसाव , लचीलापन , सटीकता  और नयापन । संवाद उबाउ नही है हा एक दो को छोड बाकी सब असरदायक है और सीन के हिसाब से है ।
- कैमरे का प्रयोग , फिल्म मे जब देशीपन और खांटीपन दिखाई दे तो फिर समझ लिजिये कैमरा उचित जगह पे है और जो पात्र कहना चाह रहा है कहने की सोच रहा है उसे दर्शक देख रहा है ।

औसत क्या है -

- फिल्माये गये गीत सीन के हिसाब से
- फिल्म के बारे मे भ्रामक प्रचार जैसे कोल माफिया पे है यथार्थ है आदि इत्यादि
- निर्देशन , अनुराग जी जिस चीज को दिखाना चाहते थे वह यथार्थ हो या न हो लेकिन काफी हद तक उसमे सफल रहे
- मनोज बाजपेयी का अभिनय , शायद इनसे बेहतर इस रोल को कोई और नही कर सकता था
- अभिनेत्रियो का Fill in The blanks की तरह प्रयोग होना

खराब क्या है -

- निर्देशक से जो अपेक्षा थी उसका 50% भी नही मिला ( यथार्थ के नाम पर निर्देशक अन्य कई फिल्मो से प्रभावित दिखे , फिल्म का नाम भी प्रभावित होकर ही लिया गया है।
- बिहारियो के हिस्से मे एक और बदनामी , झारखंड तो केवल नाम का है बाकि सब बिहार के नाम से ही हुआ है और कारण फिल्म का बैकग्राउंड , खैर जो भी हो बिहार के नाम के आगे ये ये भी जुड ही गया ।
- दबंगई / कमीनागिरी / हत्यारा / लौंडियाबाज का एक नया नाम बिहार का लाला । वैसे मनोज बाजपेयी के जगह पे कोई खलनायक टाईप के इमेज वाला बँदा इस रोल को किया रहता तो शायद इतना बुरा नही लगता ।
- कबुतर की इज्जत, और एक पंख और तो और कह के लुंगा जैसे अर्थपुर्ण लेकिन घटिहा संवाद जो आज कल के लौंडियाबाज अब धडल्ले से प्रयोग मे लाने लगे है ।
- कोल माफिया पे बनी फिल्म का नाम होने के बावजुद फिल्म कोल माफियागिरी और उसकी वजह से होने वाली परेशानियो अर्थात छल प्रपंच राजनीति और आम लोगो के जनजीवन की तबाही से कोसो दुर
- कुछ गीत केवल बिहारियो के सेंटिमेंट्स के साथ फिल्म को मैच कराने के लिये है जैसे बिहार का लाला । इस गीत का फिल्म के किरदारो के साथ कोई मेल नही है फिर भी ।
- अंततः पुरी फिल्म का एक साधारण दर्शक के सोच से भटकाव

नोट – पता नही बाकी क्या सोचते है लेकिन एक प्रयोगधर्मी प्रगतिशील निर्देशक से हमारे जैसे टुटपुजिया दर्शक एक बेहतर प्रयोग की उम्मीद रखते है । अनुराग जी और बिहार यु पी झारखंड के माटी मे जन्मे कलाकारो से या यहा से जन्मे फिल्म इंड्स्ट्री मे जुडे लोगो से हम हमेशा अलग और बेहतरीन की उम्मीद करते है एक ऐसी उम्मीद जिसमे उनके इलाके का नाम हो नाम ऐसा जिसमे पहचान न छुपानी पडे ।

उपर वाले का शुक्र है की इस फिल्म के बहुत सारे संवादो के अर्थ ( प्रायोगिक या शाब्दिक ) बिहारी + पुरबिया + पलामु के इर्द गिर्द वालो के अलावा अन्य लोग नही समझते है नही तो फरहा खान जैसे लोग तो मुह बाये खडे रहते है यह कहने के लिये भोजपुरी जैसा क्रंची और राउंची संवाद की कोशिश थी ।

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