
Dev N Pathak
Dear home: Letters from an NRB
हाय!हयात
By Dev Nath Pathak
मानसून की बेवफाई से
इस साल
एक मामूली सा हादसा ये होगा
कि बियर बहुत बिकेगा
बियर बेली बहुत बढेगा
काली कोक और पीली माज़ा भी बिकेंगी
शेक में थोडा सा बेचारा आम होगा
किसी का मुनाफा और किसी का नुकसान होगा
और एक मामूली बात शायद ये भी हो
कि मेरे राजनितिक साथियों को
एक अवसर और मिल जाए
ये मान लेने का
कि गरीबों का तो भगवान् भी नहीं होता है
सरकार तो वैसे भी होंडा वालो का ही साथ दे सकती है,
फसलों की तो बस मिटटी पलीद हो जाएगी
खेतों में इस बार उम्मीदें नहीं लहलहायेंगी
जाने कितने खेतिहर सर पर हाथ रख कर रोयेंगे
दो चार रूपये जोड़ कर
पेस्टीसाइड खरदीने की सोचेंगे
जो बचेंगे
वो बेटी-बेटे को रोयेंगे
बहरहाल
मेरी छोटी सी समझ में तो
बस इतनी सी दिक्कत है
कि इस बार मानसून के बेवफाई से
हर साल सुनाई देने वाले संगीत नहीं होंगे
गाँव में कोई मदमाती राग में कोई
प्रीत के गीत नहीं रचेगा
कोयल कि कूक से दुःख होगा
आम के महक में एक हूक होगा
मेढकों की टर्र और
बरसाती पतंगों की बर्र
सुनाई नहीं पड़ेंगे,
मिट्टी की महक
कीचड़ की चपट
बारिश के बूंदों से जन्मे
भरतनाट्यम और कत्थक
बादलों की बेपरवाह आवारगी
और मेरी बेलगाम सनक
इस बार नहीं होंगे,
काम से घर आते हुए
मजबूरन भीग जाने के अवसर
घर में बंद होकर
बारिश को देखते हुए
पकोड़े खाने के अवसर
बिना बहाने बनाये ही
काम पर ना जाने के अवसर
इस बार नहीं होंगे,
ऐसे में इस बार
वो पुराना सवाल नहीं होगा
-ज़िन्दगी कितनी खुबसूरत है
फलसफा-ए-हयात नहीं होगा,
सड़कों पर इस साल पानी नहीं लगेगा
बच्चों के कागज़ी नाव अबकी नहीं चलेंगे
और इस साल बारिश के ना होने से
मेरी कल्पनाओ को पर नहीं लगेंगे…
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Dev Pathak teaches Sociology at South Asian University, New Delhi, is among our panel of columnists. He writes his column ‘Dear home: letters from an NRB’ exclusively for bihardays on Saturdays.
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