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संयोग : पंडारा के बम शंकर जी की दास्तान

 

सच्चिदानंद सिंह

When hunting backfired!

when hunting backfired!

पंडारा के बम शंकर सिंह जी बम तो नहीं पर एक बन्दूक अमूमन हमेशा साथ रखते थे. सुबह के नाश्ते के बाद उनका पहनावा उन्नीसवी सदी के किसी अंग्रेज शिकारी का हो जाता था – घुटनों के नीचे तक पहुंचते बूट, खाकी पैंट के निचले हिस्से बूट के अंदर घुसे हुए, भारी भरकम खाकी बुशर्ट जिसमें होतीं थीं सामने की तरफ, दो छाती और दो कमर पर, चार बड़ी बड़ी जेबें, दाहिने कंधे से कमर की बायीं तरफ लटकती, कारतूस के लिए, चमड़े की एक चौड़ी बेल्ट और माथे पर सोलर हैट. इस पोशाक में, हाथ में एक दुनाली बन्दूक लिए वे रोज, देर दोपहर तक गांव के बाहर घूमते मिल सकते थे. देखने से भले बड़े भारी शिकारी लगते हों पर थे वे चिड़ीमार.

शिकार के लिए उनके इलाके में परिंदों की कोई कमी नहीं थी. पंडारा से कुछ ही दूर पश्चिम में एक बरगद का पेड़ था जिस पर ढेर सारे हरियल (हरे कबूतर) सुबह से आ जाते थे. बम शंकर जी महीने में एक-दो बार जरूर उस बरगद की तरफ जाते – बार बार जा कर वे उस शिकारगाह को बर्बाद करना नहीं चाहते थे. दिसंबर से अप्रैल तक अगर कहीं कुछ नहीं मिलता तो वे अपने खलिहान में जा कर फाख्ता मार आते. वैसे फाख्ता मारना वे बहुत पसंद नहीं करते थे. यह बहुत आसान काम था. खलिहान में बीस-पच्चीस पंडुक हमेशा अनाज चुनते रहते थे. जमीन पर लेट कर, सही लाइन में गोली चला कर कोई नौसिखुआ भी सात-आठ चिड़िया तो मार ही सकता था एक गोली से. बम शंकर जी इसे ओछा समझते थे पर जीभ से लाचार थे, कुछ नहीं मिलने पर रात के खाने के लिए पंडुक ही सही. दक्षिण में गांव के नजदीक ही एक चौर था, जिस में साल भर पानी रहता था. जाड़ों में इस में साइबेरियन बत्तक हर साल आते थे और गर्मियों में भी चहा, करलू अक्सर मिला करते थे.

सुबह नौ-दस बजे के निकले बम शंकर जी दो ढाई बजे तक घर आ कर उस दिन के शिकार को अपने खास खवास दिनेश के हवाले करते और अगर शिकार ज्यादा हो गया हो तो कौन सी चिड़िया किस पडोसी के घर भेजी जाय, किस को क्या पसंद है, किसे बहुत दिनों से नहीं भेजा गया है ऐसे संजीदा सवालों पर दिनेश से मशविरा कर के ही खाने बैठते थे. खाने के बाद वे रोज एकाध घंटे सोते थे. फिर शाम शुरू होती थी एक बोतल देसी दारु से. बहुत हाल तक वे इंग्लिस ही पीते थे पर जब शराब और कारतूस दोनों के दाम काफी बढ़ गए तो कुछ वर्ष पहले बम शंकर जी को लगा था कि या तो उन्हें अब देसी कारतूस लेने पड़ेंगे या देसी दारु. इंग्लैंड के एले कारतूसों के मुकाबिले देसी आर्डिनेंस के टोटों की मार बहुत कमजोर निकली और उन्होंने तय किया कि कारतूस विदेशी ही ठीक हैं दारु चाहे देसी हो जाय. फिर चैत से जेठ तक ताड़ी पीने लगे. उनके घर के हाते में ही दो चार ताड़ के पेड़ थे और किस्मत से सब के सब बलताड़. (ताड़ के नर और मादा पेड़ अलग अलग होते हैं जिन्हें क्रमशः बलताड़ और फलताड़ कहा जाता है. बलताड़ की ताड़ी अधिक मज़ेदार और अधिक “बली” मानी जाती है.) गांव के एक पासी को उन्होंने ताड़ी उतारने का अधिकार मुफ्त दे रखा था. चैत महीने से ताड़ी दिन में दो-तीन बार उतरने लगती थी – पहले दस बजे, फिर अपराह्न ढाई बजे और अक्सर अन्धेरा हो जाने पर तीसरी बार. ताड़ी उतारने जो भी चढ़ता था वह चढ़ते समय जोर जोर से चिल्लाता था – ताड़ी ला-आ, ताड़ी ला-आ. यह बगल के घरों में रहने वाली औरतों के लिए चेतावनी थी – अगर कोई आँगन में नहा रही हो तो ढक ले, ताड़ी उतारने वाला बहुत ऊपर चढ़ जाएगा और पड़ोस के सारे आँगन बेपर्द हो जायेंगे उसके लिए.  दूसरी पारी की एक लबनी, गर्मी के तीनो महीने, दिनेश रोज छान कर, और अपने लिए एकाध चुक्का निकाल कर, बम शंकर जी को दे आता था. वे शाम पांच बजे तक सो कर उठते थे और घुँघनी के साथ ताड़ी या दारु पीते हुए रात के खाने की तैय्यारी में लग जाते.

कौन सी चिड़िया कैसे बननी चाहिए इस पर बम शंकर जी के पुख्ता ख़याल थे; हरियल या पंडुक तेल में मसाले के साथ भूंज कर, तीतर आग में भोकसा कर और बत्तकों को गुड़-पानी में धो कर ही बनाना चाहिए. दिनेश उनकी पसंद खूब जानता था फिर भी मुंह लगे नौकर को बात करने का बहाना चाहिए और रोज पंद्रह मिनट तो बहस करता ही था अपने मालिक के साथ. खाना बनते बनते दारु / ताड़ी ख़त्म हो जाती और खाना खा कर बम शंकर जी अगले दिन किधर जाना उचित होगा इस पर विचार करते बिछौना धर लेते थे. पर वे हमेशा ऐसे नहीं थे. चालीस की उम्र में विधुर हो जाने पर उन्होंने जमशेदपुर में लगी अच्छी भली नौकरी छोड़ गांव रहने का फैसला कर लिया था.

उनके पिता जी अंग्रेजों के समय सब डिप्टी मजिस्ट्रेट हो गए थे. आज़ादी के बाद एस डी ओ, कलेक्टर बने और अंत में सचिवालय से एक ऊंचे पद से सेवा निवृत हुए. पर सचिवालय के ऊंचे पदों की ग्रामीणों में कोई गिनती नहीं है. वे अंत तक कलेक्टर साहेब ही कहलाये. कलेक्टर साहेब पर अंग्रेज हाकिमों की अमिट छाप रह गयी थी. वे घर पर भी कांटे चम्मच से ही खाना खाते थे और बिना ड्रेसिंग गाउन के वे किसी सुबह अपने कमरे से बाहर नहीं निकले. हर जाड़े वे दो तीन बार डक शूटिंग पर जरूर जाते. अच्छे निशानेबाज नहीं थे और अपने पहले दो-तीन सीजन के बाद उन्होंने उड़ते बत्तकों पर बन्दूक तानना बंद कर दिया था. पर शिकार जाते समय वे कपडे वही पहनते थे जो उन्होंने अंग्रेज हाकिमों को शिकार पर पहनते देखा था. बम शंकर जी का जन्म उनके माता-पिता के विवाह के सत्रह वर्षों बाद हुआ था. कलेक्टर साहेब ने संतान की आशा छोड़ दी थी जब कोइलवर में एक शिव मंदिर के साधू ने उन्हें पुत्र प्राप्ति का आश्वासन दिया था.

उसी मंदिर की याद में उन्होंने पुत्र का नाम बम शंकर रखा. बम शंकर जी बड़े लाड से पाले गए थे. हर दम अपने पिता के साथ रहते और उनके सारे शौक अपने पिता पर गए. कम उम्र से बन्दूक चलाने लगे थे. अठारह-बीस के होते होते उनकी गिनती अच्छे शिकारियों में होने लगी थी. पिता के प्रताप से टाटा में नौकरी लग गयी थी और बड़े चैन से जी रहे थे जब अचानक दो दिन के बुखार के बाद उनकी पत्नी का देहांत हो गया. दोनों बेटे बोर्डिंग में थे. घर में अकेले नहीं रह पा रहे थे, न ही ऑफिस में दिल लगा पा रहे थे. माता पिता पहले ही ऊपर जा चुके थे. धन की कोई कमी नहीं थी. वे अपने पुश्तैनी गाँव की ओर चल पड़े और गांव आ कर यह नया रूप उन्होंने अख्तियार कर लिया.

उस दिन वे चौर से दो सिल्ही ले कर आ रहे थे. उन्हें सिल्ही बहुत पसंद नहीं थी – थोड़ी ज्यादा बिसाइन गंध लगती थी पर चैत के उस दिन चौर पर कुछ भी और नहीं मिला. मन ही मन सोच रहे थे कि छील कर इन्हे कम से कम दो बार दस -पंद्रह मिनटके लिए गुड़-पानी में रखना पड़ेगा. पर गंध उतर जाए तो ठीक से भूनने पर सिल्ही बड़ा खस्ता बनता है – खास तौर पर सिल्ही का सीना. यही सब सोचते हुए वे घर के हाते में घुसे ही थे कि दिनेश दौड़ते हुए आया.

“मालिक, ताड़ पर एक गेहुअन सांप है”

“तो क्या हुआ?” बम शंकर जी ने चकित हो कर पूछा. गांव में बहुत सांप थे और और अगर चैत में नहीं सांप निकलेंगे अपने बिल से बाहर तो कब निकलेंगे?

“जी कल्ला (जिसे ताड़ी उतारने का काम मिल गया था) ऊपर चढ़ा हुआ है और सांप उसको घेरे हुए है”

“सांप नीचे है? कल्ला के बाद चढ़ा ताड़ पर?”

“जी ना, सांप लबनी के पास है, कल्ला हाथ बढ़ा रहा था कि सांप फुफकार दिया, अब कल्ला घिघिया गया है. उस से कुछ नहीं बन रहा है एक दाम पथरा गया है ऊपर में”

बम शंकर जी लम्बे डग भरते ताड़ के पेड़ों की तरफ चल पड़े. कल्ला और सांप दोनों दिख गए. बम शंकर जी ने जगह खोजनी शुरू कर दी जहाँ से मारने पर कल्ले को कोई छर्रा न लगे. जगह मिलने पर देखा कि एक घुटने को जमीन से सटा कर और दुसरे को भी पूरा मोड़ कर कुछ काम बन सकता है. उसी ताड़ के नीचे उन्होंने अपने बूट खोले थोडा हट कर निशाना साधा. गोली से कल्ला आहात नहीं होगा इसका उन्हें पूरा विश्वास था पर वे नहीं जानते थे कि सांप को निश्चित रूप से मार पाएंगे. कही जो सांप बच गया और बचने के बाद गोली की आवाज, या छर्रों की सरसराहट से घबड़ा कर कल्ले को डस ले या फिर गोली की आवाज से कल्ले का हाथ इस अर्ध विक्षिप्त अवस्था में छूट जाए और वह गिर पड़े? फिर उन्हों ने ऐसे विचार मन से निकाल दिए और सांप के फन को वैसे ही देखने लगे जैसे कभी अर्जुन ने मछली की आँख को देखा था.

उन्हें पता भी नहीं चला कब उन्होंने गोली चला दी. अगले क्षणसांप गिरता दिखायी दिया. गोली उसकी गर्दन पर लगी थी. उसका फन कही और उड़ गया था पर उसकी कोई पांच फीट लम्बी देह चटाक से ताड़ के नीचे गिरी थी. अब तक दस बारह आदमी जमा हो गए थे. कल्ला खिलखिलाते हुए उतरने लगा. बम शंकर जी जूते पहन कर घर की ओर चलने लगे. पर लोगों ने उन्हें घेर कर अपने कन्धों पर उठा लिया और उनकी जय जयकार करने लगे. बम शंकर जी छटपटा रहे थे पर लोगों ने उन्हें उतरने नहीं दिया. चार पांच मिनट बाद दिनेश को मालिक का चेहरा देखकर लगा कि वे किसी कष्ट से छटपटा रहे हैं. बड़ी मुश्किल से उसने उन्हें कल्ला के साथियों के हाथ से उतारा. बम शंकर जी अचेत हुए जा रहे थे. उनका मुंह कुंचित हो गया था, पूरा चेहरा विकृत लग रहा था. वे अपने दायें पैर को जोर जोर से पटक रहे थे. दिनेश ने लपक कर उनके बूट उतारे. पैर लहू लुहान था. सांप का फन बूट में उनके तलवे से कुचल गया था और इसी प्रक्रम में उसके विषैले दांत उनके तलवे में गड़ अपना विष उनकी देह में छोड़ चुके थे. वे अचेत हुए जा रहे थे. दिनेश उन्हें ब्लॉक के अस्पताल ले जाने लगा. कल्ला के सभी साथी उन्हें खटिया पर लिटा कर दौड़ चले; पर पंडारा से तीन मील जाते जाते उनके प्राण पखेरू उड़ गए.

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