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|| नमो चालीसा ||: NaMo Chaleesa, a poetic proposition!

By Sachidanand Singh

Author’s note: After he was formally declared the BJP candidate for prime ministership, just to straighten my own thoughts, I had been toying with the idea of writing about Modi. While recalling his life and career I got tempted to put it in verse – something like a ballad. But ballads get terribly lengthy and I lack perseverance. To limit the size I decided on the form of “Chaaleesa”. I expressly state that I do not consider Mr Narendra Modi a sankat mochan nor do I dream of myself as a Tulsi Das.
भयानक या भय से बचानेवाला : बचावक या सतावक ?

भयानक या भय से बचानेवाला : बचावक या सतावक ?

ज्ञान बुद्धि से हीन मैं, ना कोई आधार; रमण, कान्ति के चरण छू, लिखता हूँ इस बार ||

नहीं तुम्हारा भक्त मैं, पाऊं दोष अनेक; यह भी लेकिन सत्य है, नहीं धुला कोई एक ||

दंगे तो गुजरात में, हुए अनेको बार; लेकिन तुम्हरे राज का था कराल ब्यवहार ||

कुपित न होना नमो यदि, त्रुटि दीखें दो-चार; हंस कर जाना टाल तुम, ये निर्दोष विचार ||

सन पचास में जन्मे मोदी, दामोदर हीरा के गोदी ||१||

बचपन में स्टाल चलाया, मुसाफिरों को चाय पिलाया ||२||

वाडनगर में किये पढ़ाय, घोर डिबेटर तुम कहलाये ||३||

छोड़ पिता माता की शाला, निकल पड़े तुम दूर हिमाला ||४||

दो बरसों तक घर ना आये, साधु-संत के संग बिताये ||५||

आय परिवहन भोजनशाला, संघ प्रचारक जब बन डाला ||६||

इनरा मा के आपत काला, ए बी वी पी तुम्ही सम्भाला ||७||

पा के तुमने संघ समर्थन, बी जे पी को किया समर्पण ||८||

जोशी जीक हर लियो खतरा, किया गठित एकता जात्रा ||९||

पांचनबे में विजय दिलाई, पाटी तुमको दिल्ली लाई ||१०||

पुनः आप ने नीति लगाईं, विजयी हो गए केशू भाई ||११||

केशू भाई काम नहि कीन्हा, उप मुखमंत्री तुम को दीन्हा ||१२||

उप पद तुम ने ना स्वीकारा, नहीं बचा तब कोई चारा ||१३||

दो हजार एक जब आया, मुख्य मंत्री तुम्हे बनाया ||१४||

अगले साल फरवरी मासे, अट्ठावन हिन्दू जब नासे ||१५||

वी एच पी ने बंध पुकारा तुम ने दिया अतंकी नारा ||१६||

हुई गोधड़ा से शुरूआती, धधक उठे पूरे गुजराती ||१७||

आठ सदी इस्लामी मर गए, ढाई सदी हिन्दू भी कट गए ||१८||

हुई चहुर्दिश मारा मारी, लिप्त हुए सारे ब्यभिचारी ||१९||

कहते हैं तुम ने नहीं रोका, नहीं पुलिस को तुमने टोका ||२०||

और कहे फिर अटल बिहारी, राज धर्म तुम ने नाकारी ||२१||

दे इस्तीफ़ा सदन घुलाया, पुनः एक निर्वाचन आया ||२२||

सम्प्रदाय के गाने गाये, सत्तर प्रतिशत बहुमत पाए ||२३||

लिए नया फिर तुम अवतार, मार निकाले भ्रष्टाचार ||२४||

संघ-नीति को दिया भुलाय, उद्द्योगों को लिया बुलाय ||२५||

दो सौ मंदिर तुम तुडवाये, वी एच पी को तनिक न भाये ||२६||

मूल-भूत संरचना जोड़ी, प्रान्त-विकास-दिशा ही मोड़ी ||२७||

आया फिर दो हजार चार, गिरी एनडिये की सरकार ||२८||

दोष तुम्हारे माथे आया, लेकिन तुम को हिला न पाया ||२९||

बम्बे पर आतंकी धावा, तट रक्षा तुम ने बदलावा ||३०||

नया चुनाव दो हजार आठे, पाए प्रतिशत सात और साठे ||३१||

खेतों को बिजली दिलवाई, दश प्रतिशत विकास दर लाई ||३२||

न्यायलय ने टीम लगाईं, एसाईटी कुछ कर ना पाई ||३३||

संग अमित के और बंजारा, सोहराब को पुलिस ने मारा ||३४||

पकड़ाई जब कोदन माया, भभकी दी पर उसे बचाया ||३५||

आत्म शुद्धि पर ध्यान लगाया, भोजन त्यागा क्या कुछ पाया ||३६||

लोकायुत पर हुई लड़ाई, बेनी कमला मुंह की खाई ||३७||

नया इलेक्शन फिर जब आया, एक उनीस सीट तुम पाया ||३८||

दिल्ली ऊपर नजर गड़ाई, लाल पछाड़ श्री विजय पाई ||३९||

कठिन बहुत आगे का रस्ता,वोट मिलेगा कभी न सस्ता ||४०||

बहुत डरे हैं लोक कुछ, बोलें तानासाह; देखें क्या गुर लायेंगे बंजारा और शाह ||

शासन तेरा सख्त है, किन्तु काल अनुकूल; फिर भी मन में खौफ है, कब कर बैठो भूल ||

भगवा से अब उठ चला, है मेरा बिस्वास; सीमी, आईएम् सम लगे उनसे भी संत्रास ||

डरता तुम से बहुत हूँ, जाउंगा नहीं पास; पर ऐसे बहु-लोग हैं तुम पर जिनकी आस ||

 

संपादकीय टिप्पणी : अति – संक्षेप में इसे कहते हैं समकालीन राजनीतिक कविता।  इसमें चुहल है, भयानक विषाद है. मन का अंदरूनी मंथन है , सामने सच्चाई का पथरीला चेहरा है. 

साथ साथ पक्ष विपक्ष में कविता का आदान प्रदान होगा तो गाली गलौज में भी कटौती होगी शायद। 

 

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