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झाड़ै रहो कलक्टरगंज-काहे रिसिया गे बाबूजी के मुन्ना?

पंकज शुक्ल

झाड़ै रहो कलक्टरगंज

काहे रिसिया गे बाबूजी के मुन्ना?

पंकज शुक्ल

अपने इलाहाबाद क मुन्ना बुढ़ा तो गे हे हैं, आजु काल्हि पिच्चरौ याक ये ही नाम केरि कई रहे। पिच्चर क्यार नांव हैबूढ़ा। वइसे हमारा परेंदे वाले मामा (जहां कौन्यो लोक म अब उई होएं, भगवान उनका शांति दे) मामी कइहां बूढ़ा कहिएकै बुलावत रहै। मामा आजु जिंदा होतीं तो मामी केरे नाम पर बनति पिच्चर देखि क बहुत खुस होतीं। ई पिच्चर म अमिताभ बच्चन याक अइसे मनई क रोल कइ रहे हैं,जौन है तो बूढ़ लेकिन बूढ़ कहै प गुस्सा जाति है। उऊ खुदौ बतावति है कि जादा नाईं तो पंद्रा साल हुइगै कौन्यू सूटिंग म उनका मुक्का चलाए। लेकिन, लागति है बुजुर्गवार बच्चन सूटिंग क्या यू गुस्सा आजुकाल्हि अपने घरै जलसौ म लीन्हे आविति हैं। जादा तो नाईं लेकिन दिल्ली म अन्ना हजारे जन लोकपाल बिल खातिर जौनु अनसन कई रहे है, वहिकै बारे म कौनो न जाने उनते का कहि दीन्हैसि कि भन्नान बैइठि है।

रामधारी सिंह दिनकर क्यार नाम तो सुनै हुइहौ। उनकी याक मसहूर कविता ‘समर शेष है’ केरि अखिरी लाइनैं है समर शेष है नहीं पाप का भागी केवल व्याध, जो तटस्थ हैं समय लिखेगा उनका भी इतिहास। औ इ लइने जना परति है कि इत्ते बखत हिंदी सिनेमा केरी तमाम शख्सियतन के समहे ठाढ़ी हुइ गई हैं। करोड़न हिंदुस्तानिन क दिलन पर राजु करै वाले सितारन तो हजारे के आंदोलन क लइके रोजु सवाल कीन्हि जा रहे। और, अइसेहे याक सवाल त बाबूजी के मुन्ना रिसिया गे।

अन्ना हजारे जौने दिन अनसन प बैठ रहै, अमिताभ बच्चन बिना उन क्यार नाम लीन्हे टिप्पणी कीन्हेनि, एक क्रांति से दूसरी क्रांति तक। समय की चक्की चलती रहती है। लेकिन, एहि बारे म बार बार सवाल करै पर उनक्यार कहबु है कि यू कौनो क हक नाईं है कि ऊ कौन्यो दूसरे मनई क बारे केहू तरह केरि धारणा बना ले। फिर फिर सवाल करै क बाद अमिताभ बच्चन परसों कि आधी रात क जागि बेचरेऊ अपने दिल की बात अपने ब्लॉग पर लिखेनि। एहि बखत न सिर्फ उई गुस्सम जानि परति है बल्कि बेचरेऊ ई बातौ त बहुत हलकानौ जानि परति हैं कि लोग बाग बिना तनुकौ जाने उन पर तोहमत धरे जा रहे। ई लिखेनि कि देसहित के खातिर कौन्यो काम म साथ न होएकि बात कौनौ बेवकूफै सोचि सकति है। बड़क्के बच्चन लिखेनि, ये कहना कि मैं व्यस्त हूं, सिर्फ पैसे कमाने में रुचि लेता हूं और सामाजिक रुचि के विषयों से कोई मतलब नहीं रखता हूं, न सिर्फ गलत है बल्कि अस्वीकार्य भी है।
बच्चन आगे लिखति है कि या बात कौनो कैसे जानि सकति है कि एहि बारे मे का का कीन जा चुका है और का का कीन जा रहा है। सवाल पूछै वाली मेहरिया पर निसाना साधति भै उई आगे लिखेनि कि ई आंदोलन का ढिंढोरा पीटै क अलावा कौनो काम मीडिया कई रहा है का? हरि घंटा इ आंदोलन क बारे में रिपोर्ट दिखावे क अलावा न्यूज चैनल क्या कौनो मनई का इ आंदोलन क खातिर समर्पित है? नीक होतै कि कौनो छुटक्का खबरची लगै अपन माइक वाइक छोड़ि क अनसन पर बैठि जातै। अपन कारोबार बनाए राखै खातिर दूसरे पर ई तरह क्यार सवाल उछाल देब अपनी जिम्मेदारी त बचि निकरै क्यार सबते आसान रास्ता अहै।
खैर इत्ता सब लिखै क बादि बड़क्के तनुक अपन गुस्सा काबू म कीन्हेनि और अखिरी लाइनन म लिखेनि, कोई भी काम या योजना जो देश के हित में होती है, उसकी वो सराहना करते हैं। लेकिन इसका ढिंढोरा वह नहीं पीटना चाहते और ना ही उन्हें इसका ज्ञान है कि ये कैसे पीटा जाता है। एहिके अलावा अपने बाबूजी की लिखी भई याक कविता केरि ई लाइने बड़क्के बच्चन ट्विटर पर लिखी हइन, मैं हूं उनके साथ, खड़ी जो सीधी रखते अपनी रीढ़।

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(झाड़ै रहो कलक्टरगंज, मुंबई में बसे समालोचक, निर्देशक और लेखक पंकज शुक्ल का साप्ताहिक स्तंभ है, जो वह अब हर शुक्रवार को बिहारडेज़ के लिए लिखा करेंगे। ये नाम रखने के पीछे उनकी बचपन की कुछ यादें हैं। तब तक पूरब का मैनचेस्टर कहे जाने वाले कानपुर की मिलें मजदूरों के पसीनों के कब्रिस्तान में तब्दील नहीं हुई थीं। कलक्टरगंज में सामान खरीदना तब स्टेटस सिंबल हुआ करता था, और जैसे अब लोग विदेश यात्रा के प्रसंग अपनी शेखी बघारने के लिए सुनाते हैं, गांव कूचे के लोग तब पटरे की जांघिया पहने कलक्टरगंज की यात्रा चबूतरों पर बैठे सुना करते थे। बुजुर्गवार तब ऐसे मौकों पर ऐसी लंतरानी करने वालों पर यही जुमला कसते थे- झाड़ै रहो कलक्टरगंज!)
(पंकज शुक्ल से उनकी ईमेल आईडी  pankajshuklaa at gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है)

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